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Why did Genghis Khan reach India but then turn back? The real reason according to history:

चंगेज़ ख़ाँ भारत तक पहुंचकर वापस क्यों गया? इतिहास की सच्ची वजह

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आज से लगभग 800 साल पहले, एक मंगोल ख़ानाबदोश ने काले सागर से लेकर प्रशांत महासागर तक फैला ऐसा साम्राज्य खड़ा किया, जिसकी मिसाल इतिहास में मुश्किल से मिलती है। who was Genghis Khan—इस सवाल का जवाब यही है कि वह तेमुजिन था, जिसे पूरी दुनिया Genghis Khan के नाम से जानती है।
 
सन 1162 में, मशहूर बैकाल झील के पूर्व में स्थित एक ऊबड़-खाबड़ इलाके में उसका जन्म हुआ। मंगोल ग्रंथ ‘द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल्स’ के अनुसार, जब तेमुजिन पैदा हुआ तो उसकी हथेली में खून का थक्का था—जिसे भविष्य में एक महान विजेता बनने का संकेत माना गया।
कम उम्र में ही उसके पिता की ज़हर देकर हत्या कर दी गई, और तेमुजिन बेहद कम उम्र में बेसहारा हो गया।

genghis khan religion-अक्सर लोग उसके नाम में लगे “ख़ाँ” शब्द के कारण उसे मुस्लिम समझ लेते हैं, जबकि ख़ाँ एक उपाधि थी। चंगेज़ मंगोल था और शामानी धर्म को मानता था, जिसमें आकाश की पूजा की परंपरा रही है।

From poverty, humiliation, and struggle to world conquest:

गरीबी, अपमान और संघर्ष से विश्व विजय तक

चंगेज़ ख़ाँ का शुरुआती जीवन गरीबी, अपमान और संघर्ष में बीता।
करीब 50 वर्ष की उम्र में जाकर उसने विजय अभियान शुरू किया, लेकिन इसके बाद जो सिलसिला चला, उसने उसे इतिहास के सबसे महान योद्धाओं की सूची में ला खड़ा किया।
उसके नेतृत्व में Genghis Khan empire ने चीन, मध्य एशिया, ईरान, रूस और पूर्वी यूरोप के विशाल क्षेत्रों पर शासन किया।
उसकी सेनाएँ ऑस्ट्रिया, हंगरी, पोलैंड, वियतनाम, बर्मा, जापान और इंडोनेशिया तक जा पहुँचीं।
इतिहासकार एफ़. ई. क्राउज़ के अनुसार, चंगेज़ का साम्राज्य लगभग 1.2 करोड़ वर्ग मील में फैला था—जो अफ्रीका के बराबर और उत्तरी अमेरिका से भी बड़ा क्षेत्र था।
जहाँ सिकंदर महान को अपने पिता की बनाई सेना मिली, जूलियस सीज़र को रोमन सैन्य परंपरा का लाभ मिला और नेपोलियन को जनसमर्थन—वहीं चंगेज़ को सब कुछ शून्य से बनाना पड़ा।
 
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The murder of his stepbrother and his cruel nature: सौतेले भाई की हत्या और निर्मम स्वभाव

 

किशोरावस्था में चंगेज़ ने बाज़ों के साथ पक्षियों का शिकार करने की कला सीखी, जिसे उस समय नेतृत्व का गुण माना जाता था।
13 वर्ष की उम्र में उसने अपने सौतेले भाई बेहतेर की हत्या कर दी।
इतिहासकार फ़्रैंक मैकलिन लिखते हैं कि इतनी कम उम्र में की गई हत्या यह दिखाती है कि चंगेज़ में निर्दयता और सत्ता की समझ बहुत पहले आ चुकी थी। बेहतेर, उसके पिता का बड़ा बेटा होने के कारण सत्ता का दावेदार था।
धीरे-धीरे चंगेज़ एक शक्तिशाली सेनानायक बनता गया। उसका जीवन ज़्यादातर युद्ध और तंबुओं में ही बीता। प्रशासन उसके लिए गौण था
 

https://stock.adobe.com/search?k=%22genghis+khan%22Genghis Khan was wounded by a poisoned arrow: ज़हरीले तीर से घायल हुआ चंगेज़ ख़ाँ

जमूगा के साथ हुए एक भीषण संघर्ष के दौरान चंगेज़ ख़ाँ की गर्दन में एक ज़हरीला तीर आकर धँस गया था। यह हमला उसकी ज़िंदगी के सबसे ख़तरनाक पलों में से एक माना जाता है।
इतिहासकार फ़्रैंक मैकलिन लिखते हैं कि उस दौर में युद्ध में इस्तेमाल होने वाले तीरों पर अक्सर साँप का ज़हर लगाया जाता था। ये तीर दाँतदार होते थे, जो एक बार शरीर में घुस जाने के बाद आसानी से बाहर नहीं निकलते थे और ज़हर को पूरे शरीर में तेज़ी से फैलने का मौक़ा देते थे। आम तौर पर ऐसे घाव का इलाज ज़ख़्म को धोकर और घायल व्यक्ति को दूध पिलाकर किया जाता था, लेकिन चंगेज़ की हालत कहीं ज़्यादा गंभीर थी। तीर उसकी गर्दन की एक नस काट चुका था, जिससे तेज़ी से ख़ून बह रहा था और उसकी जान पर बन आई थी।
 
ऐसे नाज़ुक समय में चंगेज़ के विश्वस्त कमांडर जेल्मे ने उसकी जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। जेल्मे खून का बहाव तो पूरी तरह नहीं रोक सका, लेकिन उसने बिना एक पल गंवाए चंगेज़ की गर्दन से विषाक्त खून को मुँह से चूसकर बाहर थूकना शुरू कर दिया, ताकि ज़हर शरीर में और न फैल सके।
 
कुछ ही देर में चंगेज़ को होश आने लगा। जेल्मे ने तुरंत दूध की व्यवस्था की, जिससे उसकी जान बच सकी।
हालाँकि, अपनी जान बचाने वाले व्यक्ति के प्रति भी चंगेज़ का स्वभाव कठोर ही रहा। उसने रूखे लहज़े में कहा—
“क्या तुम उस ज़हरीले ख़ून को थोड़ी दूर जाकर नहीं थूक सकते थे?”
यह घटना न केवल चंगेज़ ख़ाँ के जीवन के सबसे ख़तरनाक क्षणों को दर्शाती है, बल्कि उसके निर्मम और असंवेदनशील स्वभाव की झलक भी साफ़ तौर पर सामने लाती है।
 

Genghis Khan had many flaws: चंगेज़ ख़ाँ के कई अवगुण

 

चंगेज़ ख़ाँ में कई बुरी आदतें और कमियाँ थीं, लेकिन ज़्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि उसकी राजनीतिक समझ और योजना बनाने की क्षमता बहुत मज़बूत थी। उसकी सोच तेज़ थी और वह लोगों की मानसिकता को अच्छी तरह समझता था।
 
इतिहासकार जॉर्ज वेरनाड्स्की के अनुसार, चंगेज़ युद्ध की रणनीति बनाने में बहुत निपुण था, लेकिन वह खुद सामने खड़े होकर लड़ने वाला सेनापति नहीं था। वह हालात को दूर से देखकर सही समय पर फैसले लेना पसंद करता था। जीवन में मिले कई दुखों के बावजूद वह धैर्यवान, समझदार और चालाक बनकर उभरा।
हालाँकि, उसके स्वभाव में निर्दयता, बदले की भावना और एहसान भूल जाना जैसी कमियाँ भी साफ़ दिखाई देती थीं।
मर्किट कबीले के साथ लड़ाई के समय उसकी पत्नी बोर्ते का अपहरण हो गया। किताब ‘द सीक्रेट लाइफ़ ऑफ़ मंगोल’ में इस बात की आलोचना मिलती है कि चंगेज़ अपनी पत्नी को नहीं बचा पाया, जबकि उसकी माँ होएलुन समेत कई अन्य महिलाएँ सुरक्षित निकल आई थीं।
 
इस किताब के अनुसार, उस समय चंगेज़ खुद बोर्ते के घोड़े पर बैठ गया था, जिससे बोर्ते पीछे छूट गई और उसका अपहरण हो गया। बेहतेर की हत्या के बाद उसकी माँ ने गुस्से में उसे “जानवर” और “शैतान” तक कहा था।
 
चंगेज़ बहुत सतर्क और सावधान रहने वाला व्यक्ति था। वह हमेशा सेना के आगे जाकर लड़ने के बजाय पीछे रहकर पूरी लड़ाई पर नज़र रखता और वहीं से फैसले करता था। यही उसकी आदत थी और यही उसकी सोच को दर्शाती है।
 

https://stock.adobe.com/search?k=%22genghis+khan%22&asset_id=951959568Genghis Khan’s dangerous anger: चंगेज़ ख़ाँ का ख़तरनाक गुस्सा

 

चंगेज़ ख़ाँ का गुस्सा बहुत तेज़ और खतरनाक था। वह छोटी-छोटी बातों पर भी अपना आपा खो बैठता था।
1220 के दशक में जब उसने ट्रांजोक्सियाना पर कब्ज़ा कर लिया, तब पश्चिम एशिया के मुस्लिम शासकों से बातचीत के लिए उसने एक दुभाषिए और एक लिपिक को रखा।
 
इतिहासकार मिनहाज सिराज जुज़दानी अपनी किताब ‘तबाकत-ए-नासिरी’ में बताते हैं कि चंगेज़ को खबर मिली थी कि मोसुल का राजकुमार सीरिया पर हमला करने वाला है। इस पर चंगेज़ ने अपने लिपिक से सख़्त भाषा में एक चेतावनी भरा पत्र लिखवाया, ताकि वह ऐसा करने की हिम्मत न करे।
 
लेकिन लिपिक ने अपनी समझ से उस पत्र की भाषा थोड़ी नरम और सम्मानजनक कर दी और उसमें इस्लामी शासकों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले आदर के शब्द जोड़ दिए। जब यह पत्र मंगोल भाषा में चंगेज़ को पढ़कर सुनाया गया, तो वह आग-बबूला हो गया।
गुस्से में उसने लिपिक से कहा,
“तुम ग़द्दार हो। यह पत्र पढ़कर मोसुल का राजकुमार और ज़्यादा घमंडी हो जाएगा।”
इसके बाद चंगेज़ ने ताली बजाकर अपने एक सैनिक को बुलाया और उसी समय उस लिपिक को मार डालने का आदेश दे दिया।
 
 

Cruelty and generosity go hand in hand: क्रूरता के साथ दरियादिली भी

 

चंगेज़ ख़ाँ की निर्दयता पूरे इतिहास में मशहूर है। उसके समय में किसी भी शहर पर कब्ज़ा करने के बाद युवाओं और ताकतवर व्यक्तियों को छोड़कर बाकी लोगों को मार देना आम बात थी।
 
इतिहासकार जैकब एबट अपनी किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ़ गैंगिस ख़ाँ’ में लिखते हैं कि एक बार एक बुज़ुर्ग महिला ने मंगोलों से अपनी जान बख़्शने की गुज़ारिश की। उसने वादा किया कि बदले में वह उन्हें क़ीमती मोती देगी। लेकिन जब मंगोलों ने पूछा कि मोती कहाँ है, तो महिला ने कहा कि उसने उसे निगल लिया।
मंगोलों ने मोती पाने के लिए उसका पेट चीर डाला। इस घटना के बाद उन्हें लगा कि दूसरी महिलाएँ भी मोती छुपाने के लिए ऐसा ही कर सकती हैं, और इसी वजह से उन्होंने कई और महिलाओं के पेट चीर डाले।
 
चंगेज़ को अपने नाती-पोतों से बहुत प्यार था। इतिहासकार पॉल राचनिउस्की के अनुसार, जब उसका एक पोता बामियान की घेराबंदी के दौरान मारा गया, तो उसने वहाँ के सभी लोगों को मार डालने का आदेश दे दिया जिसमें कुत्ते, बिल्ली और मुर्गियाँ भी शामिल थीं।
लेकिन इसके बावजूद चंगेज़ में दरियादिली भी थी। एक बार उसने एक किसान को धूप में पसीना बहाते देखा, तो उसने उसके सारे कर माफ़ कर दिए और उसे बंधुआ मज़दूरी से आज़ाद कर दिया।
 
यानी चंगेज़ का स्वभाव दोनों तरह का था—कभी निर्दयी, कभी उदार, और यही उसे इतिहास का एक जटिल और यादगार शासक बनाता है। और यही आगे चलकर Genghis Khan empire के विस्तार का कारण बना।
 

Cruelty was justified:

क्रूरता को ठहराया तर्कसंगत

इतिहासकार लगभग सभी मानते हैं कि चंगेज़ ख़ाँ क्रूर, प्रतिशोधी और विश्वासघाती शख़्स था। कुछ इतिहासकार तो उसे मनोरोगी तक कह देते हैं, क्योंकि उसने लोगों को मारने की अपनी प्रवृत्ति को तर्कसंगत ठहराने का तरीका ढूंढ लिया था। उसने हमेशा ग़द्दार, कपटी और देशद्रोही लोगों को ही मौत के घाट उतारा।
 
इतिहासकार वर्नाड्स्की लिखते हैं कि उस समय की परिस्थितियों में उसकी क्रूरता को असाधारण नहीं माना जाता था। 21वीं सदी में जो चीज़ें अपराध मानी जाती हैं, 13वीं सदी में वही आम बात थीं। ईसाई आक्रमणकारी भी इससे अछूते नहीं थे। उसकी क्रूरता 16वीं सदी के इंग्लैंड के हेनरी अष्टम से कम थी, और तैमूरलंग या चीनी शासकों की तुलना में भी कहीं अधिक थी।
चंगेज़ ख़ाँ हमेशा यह दावा करता था कि उसकी नीति—‘आत्मसमर्पण करो या मरो’—दुश्मनों को अपनी जान बचाने का विकल्प देती थी। उसने केवल उन लोगों को मारा जिन्होंने इस विकल्प का प्रयोग नहीं किया.
 
इतिहासकारों के अनुसार, चंगेज़ अपने साम्राज्य को फैलाने में इतना व्यस्त रहता था कि वह घोड़े से नीचे नहीं उतरता, कभी आरामदायक बिस्तर पर नहीं सोता, और अक्सर भूखा रहता था। उसे हमेशा अपनी मौत का डर सताता था, लेकिन यही कठिन जीवनशैली उसे इतना शक्तिशाली और टिकाऊ शासक बनाती थी।
 

https://www.livescience.com/43260-genghis-khan.htmlGenghis returned from the Indian border: भारत की सीमा से वापस लौटा चंगेज़

सन 1211 से 1216 तक Genghis Khan ने मंगोलिया से दूर चीन को फ़तह करने में अपना समय लगाया। इसी दौरान वह जलालउद्दीन का पीछा करते हुए भारत की सीमा तक पहुँच गया। दोनों सेनाओं के बीच आख़िरी भिड़ंत सिंधु नदी के किनारे हुई।
चंगेज़ ने जलाल की सेना को तीन तरफ़ से घेर लिया, जबकि उनके पीछे सिंधु नदी बह रही थी। इतिहासकार विलहेल्म बारथोल्ड अपनी किताब ‘तुर्किस्तान डाउन टु द मंगोल इनवेशन’ में लिखते हैं कि जलाल ने अपनी सारी नौकाएँ नष्ट कर दीं ताकि उसके सैनिक लड़ाई से भाग न सकें। चंगेज़ के पास सैनिक अधिक थे, लेकिन समस्या यह थी कि छोटा इलाका होने की वजह से उनके सैनिक तीर चलाने और तलवारबाज़ी करने में दिक्कत महसूस कर रहे थे।
 
इतिहासकार मोहम्मद नेसावी बताते हैं कि जैसे ही मंगोलों का दबाव बढ़ा, जलालउद्दीन ने अपने घोड़े के साथ 180 फ़ीट गहरी सिंधु नदी में छलांग लगाई और 250 गज़ की चौड़ाई पार कर नदी के दूसरे किनारे पर पहुँच गया। चंगेज़ ने उसकी बहादुरी देखकर अपने तीरंदाज़ों को उसका निशाना लेने से मना कर दिया, लेकिन जलाल के अन्य साथियों को नहीं बख़्शा। उसके तीरंदाज़ों ने सटीक निशाने लगाकर उनमें से अधिकांश को मार डाला। जलाल के सभी बेटों और पुरुष रिश्तेदारों को भी मौत की सज़ा दी गई।
 
जलालउद्दीन इसके बाद दिल्ली की ओर बढ़ा, लेकिन वहाँ के सुल्तान इल्तुतमिश ने मंगोलों के हमले के डर से उसे आधिकारिक शरण देने से इंकार कर दिया।
इस घटना से साफ़ है कि चंगेज़ ख़ाँ जितना क्रूर और निर्दयी था, उतना ही रणनीतिक सोच वाला और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने वाला भी था।
 

 

The Indian heat bothered Genghis:

भारत की गर्मी ने चंगेज़ को परेशान किया

 

जलालउद्दीन दिल्ली तक नहीं पहुँच पाया, लेकिन भारत में कुछ समय तक रहा, जब तक कि चंगेज़ ने उसका पीछा करने का विचार त्याग नहीं दिया।
जब जलाल को पता चला कि चंगेज़ अपने देश मंगोलिया लौट गया है, तो उसने सिंधु नदी के मुहाने से नाव के ज़रिए निकलकर समुद्री रास्ते से ईरान का रुख़ किया।
 
चंगेज़ के पुराने इतिहास को देखकर यह थोड़ा अद्भुत लगा कि उसने भारत में जलालउद्दीन का पीछा करने के लिए अपनी मुख्य सेना नहीं भेजी। इतिहासकार फ़्रैंक मैकलिन बताते हैं कि चंगेज़ ने बाला और दोरबी दोक्श्न के नेतृत्व में दो छोटी टुकड़ियाँ भारत भेजी थीं। उन्होंने सिंध नदी पार करके लाहौर और मुल्तान पर हमला किया, लेकिन गर्मी की वजह से आगे नहीं बढ़ पाए। चंगेज़ और उसकी सेना भारत की तीव्र गर्मी के आदी नहीं थे, और यही उनकी बड़ी बाधा बनी।
 
दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने जलालउद्दीन को शरण नहीं दी, और साथ ही चंगेज़ को भी जलाल का पीछा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। इतिहासकार जॉन मेक्लॉयड के अनुसार, इल्तुतमिश ने साफ़ मना कर दिया, लेकिन चंगेज़ को नाराज़ नहीं किया। चंगेज़ ने समझ लिया कि इल्तुतमिश इस मुद्दे पर उससे युद्ध नहीं चाहता, और वह भी उससे लड़ाई करने की स्थिति में नहीं था।
 
इतिहासकार द्र विंक अपनी किताब ‘स्लेव किंग्स एंड द इस्लामिक कॉन्क्वेस्ट’ में लिखते हैं कि भारत की गर्मी चंगेज़ के लिए असहनीय थी, और इसी वजह से उसकी सेना ने वापसी का फ़ैसला किया।
यह घटना यह दर्शाती है कि सैनिक क्षमता और रणनीति के बावजूद प्राकृतिक परिस्थितियाँ भी बड़े नेताओं की योजनाओं पर असर डाल सकती हैं।
 

 

https://historycollection.com/40-awe-inspiring-facts-about-genghis-khan-and-the-mongol-empire/Shortage of horses and their fodder:

घोड़ों और उनके चारे की कमी

चंगेज़ ख़ाँ के सामने भारत में एक बड़ी समस्या घोड़ों और उनके चारे की कमी थी। इतिहासकार इब्न बतूता बताते हैं कि मंगोल सेना की दस हज़ार घोड़ों की टुकड़ी को 250 टन चारा और ढाई लाख गैलन पानी की आवश्यकता होती थी। सिंध और मुल्तान में पानी तो उपलब्ध था, लेकिन पर्याप्त चारा नहीं।
 
इसके अलावा, उस इलाके में उच्च गुणवत्ता वाले घोड़ों की कमी थी, इसलिए अतिरिक्त घोड़ों का इंतज़ाम करना भी मुश्किल था। चंगेज़ ने इतनी अधिक भूमि जीत ली थी कि उस पर नियंत्रण के लिए उसके पास पर्याप्त सैनिक भी नहीं थे। इसके अलावा, सैनिकों का स्वास्थ्य और थकान भी बड़ी चुनौती बन रही थी।
 
इतिहासकार फ़्रैंक मैकलिन लिखते हैं कि कई मंगोल सैनिक बुख़ार और बीमारियों का शिकार हो गए थे। चंगेज़ को भारत के जंगलों और पहाड़ों के बारे में सटीक जानकारी नहीं थी। वह अंधविश्वासी भी था; उसके सैनिकों ने एक गैंडे को अपशकुन मानकर डर के कारण आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।
इन सभी कारणों—घोड़ों और चारे की कमी, सैनिकों की थकान और बीमारियाँ, भूगोल और अंधविश्वास—के चलते चंगेज़ ने भारत से वापस लौटने का फ़ैसला किया।

Genghis’s last message: चंगेज़ का आख़िरी संदेशhttps://www.livescience.com/genghis-khan-death-cause-revealed.html

जुलाई 1227 तक चंगेज़ ख़ाँ का स्वास्थ्य गिरने लगा था। एक दिन genghis khan children और भरोसेमंद जनरलों को अपनी पलंग के पास बुलाया।
मंगोल लोगों को बताया गया कि चंगेज़ को बुख़ार है, Genghis Khan death cause लेकिन पलंग के पास खड़े लोग समझ गए कि वह बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहेगा।
इतिहासकार आर डी थैक्सटन अपनी किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल्स’ में लिखते हैं कि चंगेज़ ने अपनी पलंग पर लेटे हुए बेटों से कहा:
“ज़िंदगी बहुत छोटी है। मैं पूरी दुनिया नहीं जीत सका। तुम्हें यह काम पूरा करना होगा। मैं तुम्हारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य छोड़ कर जा रहा हूँ। इसकी रक्षा केवल एक चीज़ पर निर्भर करेगी—तुम संगठित रहो। अगर तुम आपस में लड़ोगे, तो यह साम्राज्य तुम्हारे हाथ से फिसल जाएगा।” कुछ समय बाद ही चंगेज़ ख़ाँ इस दुनिया को अलविदा कह गया।
 
इस आख़िरी संदेश से साफ़ है कि चंगेज़ ने अपने साम्राज्य की सुरक्षा और संगठन को अपनी मृत्यु से पहले भी सबसे बड़ी प्राथमिकता माना।
 
 

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FAQ : Genghis Khan : चंगेज खान मुख्य प्रश्न और उनके उत्तर

चंगेज खान कौन था

चंगेज़ ख़ान, जिनका असली नाम तेमुजिन था और जिनका जन्म लगभग 1162 में हुआ, एक प्रसिद्ध मंगोल योद्धा और शासक थे। उन्होंने अलग-अलग बिखरी हुई मंगोल जनजातियों को एकजुट किया और मंगोल साम्राज्य की नींव रखी, जो आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा स्थलीय साम्राज्य बना। चंगेज़ ख़ान अपनी बहादुरी, सख़्त युद्ध नीति और बड़ी-बड़ी जीतों के लिए जाने जाते हैं। उनके नेतृत्व में मंगोल साम्राज्य एशिया से लेकर यूरोप तक फैल गया। इतिहास में उनका नाम आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने दुनिया को गहराई से प्रभावित किया और उनकी संतानें आज भी लाखों लोगों में पाई जाती हैं।

चंगेज खान की मौत कैसे हुई?

चंगेज़ ख़ान की मौत का असली कारण आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है। ज़्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि उनकी मृत्यु 1227 ई. में चीन में चल रहे एक सैन्य अभियान के दौरान हुई। माना जाता है कि या तो वे घोड़े से गिरने की वजह से गंभीर रूप से घायल हुए थे, या फिर किसी बीमारी के कारण उनकी मौत हुई। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर कई कहानियाँ मिलती हैं, लेकिन सभी पर एक जैसा भरोसा नहीं किया जाता।

चंगेज़ ख़ान की मौत से जुड़े मुख्य कारण और मत:

घोड़े से गिरने की घटना:
सबसे ज़्यादा मानी जाने वाली बात यह है कि शिकार के दौरान चंगेज़ ख़ान अपने घोड़े से गिर गए थे। इस हादसे में उन्हें अंदरूनी चोटें आईं, जो धीरे-धीरे गंभीर हो गईं और अंत में उनकी मृत्यु हो गई।

बीमारी:
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चंगेज़ ख़ान किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए थे। उस समय सैनिक शिविरों में प्लेग, टाइफाइड और मलेरिया जैसी बीमारियाँ आम थीं, और संभव है कि इन्हीं में से किसी बीमारी ने उनकी जान ले ली।

तीर लगने की कहानी:
प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो के अनुसार, एक युद्ध के दौरान चंगेज़ ख़ान के घुटने में तीर लगा था। बाद में उस घाव में संक्रमण फैल गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि इस मत को सभी इतिहासकार पूरी तरह स्वीकार नहीं करते।

चंगेज खान को कहाँ दफनाया गया है?

चंगेज़ ख़ान को कहाँ दफनाया गया था, यह बात आज तक एक बड़ा रहस्य बनी हुई है। माना जाता है कि 1227 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें मंगोलिया में बुरखान खलदुन पर्वत के आसपास किसी गुप्त स्थान पर दफनाया गया था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि उनकी कब्र कभी किसी को न मिल सके। चीन में बना “चंगेज़ ख़ान का मकबरा” असल में उनकी कब्र नहीं है, बल्कि केवल एक स्मारक है।

चंगेज़ ख़ान की कब्र से जुड़े मुख्य तथ्य:

कब्र का स्थान अज्ञात:
कहा जाता है कि अंतिम संस्कार के समय कब्र की जगह को पूरी तरह गोपनीय रखा गया। कुछ कथाओं के अनुसार, जिन लोगों ने दफन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, उन्हें भी मार दिया गया, ताकि कोई भी इस जगह के बारे में न जान सके।

संभावित दफन स्थान:
अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि चंगेज़ ख़ान को उनके जन्मस्थान के पास, मंगोलिया के खेंटी प्रांत में स्थित बुरखान खलदुन पर्वत के आसपास दफनाया गया था।

चीन में बना मकबरा:
चीन के इनर मंगोलिया क्षेत्र के ओरडोस शहर में स्थित चंगेज़ ख़ान का मकबरा एक धार्मिक और पर्यटन स्थल है। यहाँ चंगेज़ ख़ान की याद में पूजा होती है, लेकिन उनका शव वहाँ नहीं है।

आज भी बना हुआ रहस्य:
लगभग 800 साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी, चंगेज़ ख़ान की असली कब्र कहाँ है, यह अभी तक किसी को पता नहीं चल सका है।

चंगेज खान को किसने हराया

चंगेज़ ख़ान को युद्ध में किसी एक व्यक्ति ने नहीं हराया था। उनकी मौत किसी लड़ाई में हार की वजह से नहीं हुई, बल्कि माना जाता है कि 1227 ई. में उनकी मृत्यु स्वाभाविक कारणों से हुई। इतिहासकारों के अनुसार, या तो वे घोड़े से गिरने के कारण गंभीर रूप से घायल हुए थे, या फिर मलेरिया जैसी किसी बीमारी से उनकी जान चली गई।

यह सही है कि चंगेज़ ख़ान के जीवनकाल में कुछ इलाकों में छोटे-मोटे विद्रोह हुए थे, लेकिन उन्हें कभी सीधे तौर पर युद्ध में हराया नहीं जा सका। उनकी मृत्यु के बाद, उनके वंशजों और उत्तराधिकारियों ने साम्राज्य संभाला। बाद के समय में भारत जैसे क्षेत्रों में मंगोलों को अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासकों ने पराजित किया, लेकिन यह जीत चंगेज़ ख़ान के खिलाफ नहीं थी। इसलिए इतिहास में चंगेज़ ख़ान को एक ऐसे शासक के रूप में देखा जाता है, जिन्हें उनके जीवनकाल में कोई भी युद्ध में पराजित नहीं कर पाया।

चंगेज खान की कितनी पत्नियाँ थीं?

चंगेज़ ख़ान की कई पत्नियाँ और रखैलें थीं। ज़्यादातर महिलाएँ उन्हें युद्ध में जीते गए इलाकों से मिली थीं। कई बार ये महिलाएँ पूरे मंगोल साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लाई जाती थीं। जिन महिलाओं को उनकी पत्नी या रखैल बनाया जाता था, वे अक्सर राजघरानों से जुड़ी होती थीं, जैसे राजकुमारियाँ या रानियाँ। कुछ को युद्ध में बंदी बनाया गया था, जबकि कुछ को उपहार के रूप में उन्हें सौंपा गया था।

चंगेज़ ख़ान की प्रमुख पत्नियों में तातार समुदाय की दो बहनें — येसुगेन और येसुई — सबसे अधिक प्रभावशाली मानी जाती हैं। इन दोनों का उनके जीवन में विशेष स्थान था। कहा जाता है कि जब चंगेज़ ख़ान तंगुत साम्राज्य के खिलाफ अपने अंतिम सैन्य अभियान पर निकले थे, तब वे येसुई को भी अपने साथ लेकर गए थे।

चंगेज खान की मृत्यु के समय उनकी उम्र कितनी थी?

चंगेज़ ख़ान की मृत्यु के समय उनकी उम्र लगभग 65 से 72 वर्ष के बीच मानी जाती है। उनका निधन अगस्त 1227 ई. में हुआ था। इतिहासकारों के बीच उनके जन्म वर्ष को लेकर थोड़ा मतभेद है—कुछ के अनुसार उनका जन्म 1155 में हुआ था, जबकि कुछ 1162 मानते हैं। इसी वजह से उनकी सही उम्र का अनुमान अलग-अलग लगाया जाता है, लेकिन यह तय है कि वे 60 से 70 वर्ष की उम्र के बीच थे।

मुख्य बातें:

  • निधन: अगस्त 1227 ई.

  • उम्र: लगभग 65–72 वर्ष

  • मृत्यु स्थान: यिनचुआन, पश्चिमी शिया (Western Xia)

  • मृत्यु का कारण: शिकार के दौरान घोड़े से गिरने से लगी चोटें और उसके बाद हुई बीमारी

क्या चंगेज खान ने भारत पर हमला किया था?

चंगेज़ ख़ान 1221 ईस्वी में भारत की सीमा तक पहुँचा था। वह ख्वारिज्म के शासक जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा करते हुए सिंधु नदी के किनारे तक आया और वहीं उसे पराजित किया। इसके बाद चंगेज़ ख़ान ने भारत के अंदर गहराई तक हमला नहीं किया और वापस लौट गया। हालांकि, उसने अपनी सेना की कुछ छोटी टुकड़ियाँ भेजीं, जो मुल्तान तक पहुँचीं, लेकिन वे मुल्तान पर कब्ज़ा नहीं कर सकीं।

इस घटना से जुड़े मुख्य तथ्य आसान शब्दों में:

भारत तक पहुँचने की स्थिति:
1221 में चंगेज़ ख़ान जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा करते हुए सिंधु नदी के तट तक पहुँचा था। यहाँ दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ, जिसमें जलालुद्दीन हार गया।

वापस लौटने के कारण:
चंगेज़ ख़ान ने भारत के भीतर आगे बढ़ने का फैसला नहीं किया। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की तेज़ गर्मी मानी जाती है, जिसके लिए मंगोल सैनिक तैयार नहीं थे। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि चंगेज़ ख़ान ने किसी संकेत या सपने के कारण लौटने का निर्णय लिया।

इल्तुतमिश की भूमिका:
उस समय दिल्ली सल्तनत पर इल्तुतमिश का शासन था। उन्होंने जलालुद्दीन मंगबरनी को शरण देने से इनकार कर दिया था। इससे चंगेज़ ख़ान को भारत पर सीधा हमला करने का कोई ठोस कारण नहीं मिला।

बाद के मंगोल हमले:
चंगेज़ ख़ान के जीवनकाल में भारत पर कोई बड़ा सीधा आक्रमण नहीं हुआ, लेकिन बाद के वर्षों में मंगोलों ने कई बार भारत पर आक्रमण किए।

चंगेज खान के कितने बच्चे थे?

चंगेज़ ख़ान के कई बच्चे थे। उनके चार बेटे सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध माने जाते हैं, क्योंकि आगे चलकर वही मंगोल साम्राज्य के उत्तराधिकारी बने। इनके अलावा उनकी कई बेटियाँ भी थीं, लेकिन मंगोल इतिहास में बेटियों का ज़िक्र कम मिलता है, इसलिए उनके नाम और संख्या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

चंगेज़ ख़ान के चार प्रमुख बेटे:

जोची (Jochi):
जोची चंगेज़ ख़ान के सबसे बड़े बेटे थे। उन्होंने आगे चलकर गोल्डन होर्ड नामक साम्राज्य की नींव रखी।

चगताई (Chagatai):
चगताई दूसरे बेटे थे। उनके नाम पर चगताई खानत की स्थापना हुई, जो मध्य एशिया में एक शक्तिशाली राज्य बना।

ओगेदेई (Ögedei):
ओगेदेई चंगेज़ ख़ान के तीसरे बेटे थे। पिता की मृत्यु के बाद वे मंगोल साम्राज्य के दूसरे ग्रेट खान बने।

तोलुई (Tolui):
तोलुई चंगेज़ ख़ान के सबसे छोटे बेटे थे। उनके वंश से आगे चलकर कुबलाई ख़ान और हुलेगु ख़ान जैसे प्रसिद्ध शासक पैदा हुए।

इन चारों के अलावा, चंगेज़ ख़ान की कई पत्नियाँ थीं और उनसे अन्य बच्चे भी हुए, लेकिन उनके बारे में इतिहास में बहुत कम जानकारी मिलती है।

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